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Thursday, November 21, 2019

लिख डाल


क़लम में स्याही डाल 
लिख डाल 
काग़ज़ पर उँड़ेल हाल 
लिख डाल। 

अनकही कहानियाँ 
तुमको जो सुनानी हैं 
दिल की परेशनियाँ 
करती जो अंदर बवाल
लिख डाल।

दर्द जो सताते हैं 
टीस ले के आते हैं 
साये जो डराते हैं
सारे डर बाहर निकाल 
लिख डाल।

टूटे हुए सपनों को 
बेगाने हुए अपनों को 
दिल में ना रख 
फेंक दे बाहर निकाल
लिख डाल। 

हो सके तो भूल जा 
हो सके तो माफ़ कर 
पर एक बार काग़ज़ पर 
सभी का हिसाब कर 
फिर फाड़ कर हिसाब को 
साफ़ कर कूड़े में डाल 
लिख डाल।

तब नयी कोई बात कर 
ख़ुद से मुलाक़ात कर 
इतिहास की ना बात कर 
नयी शुरुआत कर 
डोर अपनी ख़ुद सम्भाल
तेरी कहानी है बेमिसाल 
लिख डाल।



Monday, September 17, 2018

बप्पा

होने लगा है धूम धड़ाका 
लो गए गणपति बप्पा 
ढोल नगाड़े धक्कम धक्का 
ट्रैफिक में अटके हैं बप्पा 
यहां के राजा वहां के राजा 
हर एक गली के अपने बप्पा 
विशेष अतिथि का है सम्मान 
और वही मेहमान हैं बप्पा 
कितने रूपों स्वरूपों में 
सर्वव्यापी गणपति बप्पा 
छप्पन भोग लगा लो चाहे 
मोदक खा कर मस्त हैं बप्पा 
मसरूफ लोगों के घर में 
एक आध दिन ठहरते बप्पा 
गौरी मां संग पंचम दिन 
बहुत घरों से जाते बप्पा 
बड़े-बड़े पंडालों में तो 
देखो कैसे सजे हैं बप्पा 
रोशनी की भरमार में 
सारी रात जगे हैं बप्पा 
दस दिन के त्यौहार में
बड़े बड़े इश्तिहार में 
क्या क्या देख रहें हैं बप्पा 
कुछ ने मन से किया भजन 
कुछ फिल्मी धुन में रहे मगन 
सब की मंशा जान रहे हैं 
तर्क समझने वाले बप्पा 
कौन हैं करते उनकी पूजा
और जो करते काम दूजा 
कुछ भी उन से छिपा नहीं है 
सभी जानते गणपति बप्पा 
अनंत चतुर्दशी के दिन 
अनंत में समा जाते बप्पा 
अगले वर्ष लौटने का 
वादा करके जाते बप्पा
मन की आंखों से देखो तो 
अपने भीतर बसते बप्पा 
सच्चे मन से नमन करो तो 
बस पुलकित हो जाते बप्पा 
बप्पा कहीं नहीं जाते हैं
कहीं नहीं जाते हैं बप्पा 

—-मृदुल प्रभा


Tuesday, March 13, 2018

मुंबई शहर में मेहमान आए हैं


मुंबई शहर।  चित्र : मृदुल प्रभा @writingdoll fotografie
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

गूंगे बहरों के इस शहर में
कहने अपनी दास्तान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

यह दाना दाना बोते हैं
फसलों संग जगते सोते हैं
कम पैसों में फसल बेच के
खून के आंसू रोते हैं
अपनी मेहनत का सही दाम हो
ढूंढने कोई समाधान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए है 
नाशिक पार से किसान आए हैं

पांव में इनके छाले हैं
हौसले इन के निराले हैं
तपती सड़क पर मिलो चल कर
छोटे बच्चे घरवाले लेकर
एक सच्चे वादे के लिए
छोड़ कर खेत और खलिहान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

शायद कोई अंकुर फूटे
शायद फल जाए मेहनत इनकी
सियासत की बंजर धरती पर
आशा का बीज बोने नादान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

धरती में जीवन बोने वाले
मरने को मजबूर हैं
और शहरों में रहने वाले
सच्चाई से दूर हैं
इसलिए लाल झंडे लेकर
हरे खेत को छुट्टी देकर
हक मांगने आए हैं
नहीं लेने किसी का एहसान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

--मृदुल प्रभा


Thursday, November 24, 2016

माँ

माँ घर में रहती थी
हमारी ज़रूरतें पूरी करती थी
हर तरह की ज़रूरतें
हम सभी की ज़रूरतें
माँ हमारी सीढ़ी बनी
हम ज़मी से आसमान हो गए
हम ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार में
उसकी धीमी धीमी ज़िंदगी को पीछे छोड़ते चले गए

माँ जो घर की हर चीज़ में समायी रहती थी
अब सिमट गयी है एक कोने में
एक बिस्तर पर वक़्त की चादर लपेटे
इंतज़ार आँखों में समेटे
माँ बहुत कुछ कहना चाहती है पर कहती नहीं

हम स्वार्थी हैं, ये भी माँ जानती है
माँ अब हमारी स्वार्थी हो जाने की ज़रूरत को पूरा करती है।

।। मृदुल प्रभा ।।

Saturday, November 14, 2015

चल बच्चे बन जाते हैं

चल बच्चे बन जाते हैं
बचपन में लौट जाते हैं,
सहज और सरल हो जाते हैं
भरी दुपहरी में खेल के आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

तुम अमियाँ तोड़ के लाना
मैं नमक मिर्ची लाऊँगी
बरसाती में बैठ के चटखारे ले के खाते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

मिट्टी पे नाम लिखते हैं
स्लेट पे शक्लें बनाते हैं
और दिल के किसी कोने में ढाँप के रख जातें हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

बहोत दिनों से तुम घर पे नहीं आए
चल घर घर खेलते हैं
एक दूसरे के घर हो आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

शायद किसी का मकां बन रहा है,
रेत का ढ़ेर आया है
चल न, रेत में हम भी घर बनाते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं 

शरारत करने का मन है
मंदिर के पास वाले पीपल के पेड़ से
किसी की मन्नतों के धागे खोल आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

चकाचौंध बहोत है सपनों के शहर में
तेज़ रौशनी में दोस्त भी नहीं दिखते
चल अपने छोटे से शहर हो आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

चल अबकी बार होली में
कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते
रंगों से भर आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं



Saturday, July 4, 2015

वो

वो जब भी बैठता है ज़ोर ज़ोर से पैर हिलाता है
दो कदम पास आता है तो वापिस लौट जाता है

अज़ीब कशमकश में रहता है वो शख़्स
दूर जा न पाता है न पास बैठ पाता है

और, अजीब इत्तेफ़ाक़ है ये ज़िन्दगी के
हम जिसे याद करते हैं वो हमको भुलाता है

सर्द चाँदनी रातों में नींद कहाँ आती है
उसके घर में वो साया जब नज़र आता है

उसको पोंछू, सुखायुँ मैं निभायुं कैसे
समंदर बेहयाई का वो पीछे छोड़ जाता है

मृदुल

Recited it on the inaugural Poetry Event of FWA.  Please do not copy, paste or reproduce in any form without my written consent. All creative works on my blog are registered. Copyright@Mridual aka writingdoll

Wednesday, June 24, 2015

रफ़्ता रफ़्ता

कैसे बदल जाती है हर बात रफ़्ता रफ़्ता
कैसे बदल जाते हैं हालात रफ़्ता रफ़्ता

कब, कहाँ, क्यों, क्या हो जाता है
कैसे उभर आते हैं सवालात रफ़्ता रफ़्ता

शब-ए-ग़म भी लम्बी हुआ करती है अक्सर
फ़िर भी गुज़र जाती है हर रात रफ़्ता रफ़्ता

यह इश्क़ भी ज़ालिम मर्ज़ होता है ऐसा
करती है असर भी हयात रफ़्ता रफ़्ता

यूँ तो मेरी उस से पहचान है पुरानी
पर भूलने लगी हूँ हर बात रफ़्ता रफ़्ता

देने वाला था मुझको जो प्यार बेशुमार
खुशीयाँ चुरा के ले गया वो यार रफ़्ता रफ़्ता

I wrote this one in 1986 ... those were the days.... of Gazals. Recited it on the inaugural Poetry Event of FWA.  Please do not copy, paste or reproduce in any form without my written consent. All creative works on my blog are registered. Copyright@Mridual aka writingdoll

Tuesday, June 23, 2015

एक लड़की की तरह???

"क्या एक लड़की की तरह रोता है!"
"क्या एक लड़की की तरह रोता है?"

"क्या   एक    लड़की  की  तरह  रोता  है?"
मात्र इन 'शब्दों' से ही 
एक लड़के का अपमान होता है
कि जैसे रो देना हो एक गन्दी बात,
अौर लड़की होना उससे भी शर्मनाक
इसी क्षण  में…….
उसके मन में…..
एक सोच जन्म लेती है 
जो किसी भी अौरत के अपमान का
अंकुर बो देती है।

Wrote this piece when I was working on my art installation Broken Doll House at KGAF 2013. This became a very popular and was widely shared. Recited this for the TV Coverage for news channels, recited this @Prithvi Theatre, open mic, Avotoko Room theatre, FWA poetry event. Please do not copy, paste or reproduce in any form without my written consent. All creative works on my blog are registered. Copyright@Mridual aka writingdoll

Tuesday, February 10, 2015

लैची चाचा के संग होली

होली आई, आई होली
खुश है बहुत बच्चों की टोली
नयी पिचकारी नए रंग
खेलेंगे अपनों के संग
भर पानी गुब्बारों में
फेंकेंगे चौबारों से।

हर होली पे लैची चाचा
पहन सफ़ेद कुरता आते
ज़रा रंग लग जाये तो
जोर जोर से चिल्लाते

मन करता था पूछें उनको
घर में काहे नहीं रहते हो
बच्चों को उकसाते हो
क्यों इतना गुस्साते हो

इस से पहले लैची चाचा
कुछ कहते कुछ समझाते
चारों ओर से गुब्बारों की
उन पर ऐसी बौछार पड़ी
अबीर गुलाल के उड़ते बादल
पिचकारी की भी धार पड़ी
नीले, लाल, पीले, काले
मुँह, सर, पैर बुरे रंग डाले

यहाँ वहां खड़े थे रंग चोर
चारों ओर मचा था शोर
रंगे वानरों की भीड़ में
किसी को न पहचान सके
लैची चाचा संग हुआ क्या
बौखलाए कुछ न जान सके

बंदरों के समान उछलती
आई फिर बच्चों की टोली
रंग बिरंगी गुड़िया जैसी
इक नन्ही सी लड़की बोली
"लैची चाचा बुरा न मानो
होली है,  होली है होली।"

Childhood memories are the sweetest and they occupy that special corner in one's heart. 'Laichee' uncle was one eccentric old man in my home town, who reacted quite similar to the way I have written here. He hated it when someone called out 'Laichee' .... and hurled shoes at them. I bore the brunt of someone's mischief when he hurled a shoe at me on my way back home from school. I never knew why. Then he would actually dare people to spoil his white Kurta on Holi. Everyone was so scared yet people would throw some colour at him from roof tops. This would kick start his non stop gaalis and laughter all around. This poem is dedicated to his memory..where ever he is. And Holi is a wonderful festival of colours to express love and joy.. even to the eccentric oldies. :) Wrote in March 2014

Do not copy in any way. It is registered under copy right law. mridual@writingdoll

गणित ज़िन्दगी का

गणित ज़िन्दगी का

स्कूल में मुझे गणित नहीं था भाता
शायद इसलिए नहीं था आता
या फिर गणित मुझे नहीं था आता
शायद इसलिए नहीं था भाता

मेरे दिमाग में अंकों से बहशत छा जाती
आंकड़ों के सामने दिमाग की बत्ती बंद हो जाती
मेरी माँ का गणित था बहुत अच्छा
मेरे लिए उनकी ऊन का उलझा लच्छा
वह रात को अक्सर मुझे गणित पढ़ाती
गणित से तो मुझे दिन में भी नींद आ जाती
एक एक प्रश्न को वो स्लेट पर समझाती
जो स्लेट पर से मिटते ही दिमाग से मिट जाती
कई प्रश्न मुझे कभी समझ नहीं आए
समझ नहीं आया कि ऐसे प्रश्न ही क्यों उठाये
जैसे, "कि एक टैंक भरता है
पर एक नल टपकता है
तो कितने वक़्त में वह
टैंक खाली करता है'
अरे टैंक है भरना
तो खाली क्यों करना
पानी बचाओ नल बदलवाओ
इन बेवज़ह प्रश्नों से बच्चों को बचाओ

खैर गिरते पड़ते लड़खड़ाते
हम बड़े तो हो गए गणित से टकराते
आज भी अंकों में उलझ हैं जाते 
साधारण समीकरण ही समझ पाते 
सब्ज़ी की दूकान पर मन है हड़बड़ाता
जब काँटा 420, 140 जैसे आँकड़े दिखाता
"भैया सिर्फ एक किलो, आधा किलो या फिर एक पाव"
क्योंकि उतना ही समझ आता है मोल भाव
दर्जन डेढ़ दर्जन का भी हिसाब है आसान
पर लौकी और गोभी करती है परेशान
अनुमान से ढूँढो तो शायद मिल जाये दूजा
ठीक एक दो किलो का पपीता और ख़रबूज़ा 

आँकड़े ही आँकड़े, चाहे कुछ भी कर लें 
जिंदगी ने नंबरों का जाल है बिछाया 
फोन नंबर, बैंक नंबर, कंस्यूमर नंबर
पिन नंबर, डिन नंबर, अब आधार भी आया

रो धो के कैसे भी जीवन का गणित चलाया
क्योंकि गणित से पीछा कौन छुड़ा पाया ।।

Friday, December 5, 2014

स्वच्छ सुन्दर भारत यह मेरा सपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

तन भी साफ़, मन भी साफ़
हो लोगों का जीवन साफ़
स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत
यही मेरी कल्पना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

मन में आस, मन में विश्वास
जहाँ देवो का हो वास
'स्वच्छ सुन्दर भारत'
यही मूल मंत्र जपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

जहाँ धरती माँ हो हरी भरी
जहाँ नदियों का जल हो निर्मल
जहाँ स्वच्छता का हो आभास
और सब कुछ लगे ख़ास
मुझे उस भारत में बसना है
वह भारत मेरा अपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है


I had written this poem around Independence day.  Those who know me can understand how I feel about this cause. I, along with my friends had taken up Cleanliness Drive in our building three years back against all odds and transformed the surroundings. We still do periodic follow up. There is plenty to do and if we all do a little bit we will create the most beautiful world around us. It extends towards spirituality. From cleaning outside to our inner-selves. 
Copyright. mridual aka writingdoll

Tuesday, October 14, 2014

My life..untitled..(on this birthday)

न जाने आज मेरा कौन सा बर्थ डे है
तीन साल पहले ही तो पहला वोट दिया है
मैं उम्र को सालों में गिनती नहीं हूँ 
इन नम्बरों सालों को समझती नहीं हूँ

बेकार ब्यूटी ट्रीट्मेंट्स मैं कराती नहीं
बेवजह उम्र को भी मैं छुपाती नहीं
कैसा है जैसा है वैसा यह तन है
पर बच्चों का सा चंचल यह मन है

हर सुबह सूरज से धूप ले आती हूँ 
हर शाम चंदा के संग बतियाती हूँ
हँसती हूँ और गुनगुनाती हूँ
बच्चों सी खिलखिलाती हूँ

किसी किसी दिन थोड़ी बड़ी भी हो जाती हूँ
उस दिन गंदे कबूतरों की कलास लगाती हूँ
कुछ बेचारे कौवे भी सुबह को आ जातें हैं
उन्हें कभी कभी पंजाबी परांठे खिलाती हूँ

संवेदनशील कुछ ज़्यादा हूँ
सो भावुक हो पड़ती हूँ
मेरे बच्चे मुझ पे हँसते हैं
जब मैं यूँ ही रो पड़ती हूँ

वो भी फ़िकरे कसता है
जो मेरे अन्दर बसता है
"तुम सचमुच बेमिसाल हो
लुत्फ़ की टक्साल हो"
कह कर वो हँस पड़ता है

"थैंक यू, सब खुद ही करवाते हो
और मेरा नाम लगाते हो
मेरी हर ख़ुशी में तुम
कितने खुश हो जाते हो"
मैं सीटी मार चल देती हूँ

मगरूर नहीं मशहूर नहीं
पर मैं शोहरत से दूर नहीं
जब पाँवो से थक जाती हूँ
तो मैं उड़ने लग जाती हूँ.

मैं ज़िन्दगी के हरेक रस को
निचोड़ कर पिए जाती हूँ
इक इक पल में इक जीवन
कुछ ऐसे मैं जिए जाती हूँ

I share my birthday with Cliff Richard...I like his songs, full of life, very happy.. My birthday is my stock taking day. Today when I started my day this is exactly how I felt. So I wrote this poem. My mind refuses to grow old or get tired or feel sad.. There is so much to do in one life time... so so much. So I can not afford to waste my time..even with my aching feet I will go on...may be take off and start flying.. because someone out there is going to give me the wings and show me the way.

A heart felt thank you to so many friends who wished me today. I am overwhelmed with the love and blessings. I have every reason to smile. :) and laugh :D Thank you God.

Friday, July 25, 2014

कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

या मर्द बनाता या औरत बनाता
या उनको बनाता या हमको बनाता 
कुछ इस तरह से दुनिया सजाता

यह लाँछन लगाते हैं दर्द पिरोते हैं
खंजर चुभोते हैं ऐसे मर्द होते हैं
कैसे ये समझें न रिश्ता न नाता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

क्यों औरत बनाई डरी सकुचाई
निर्भय हुई भी तो मर्द की परछाई 
क्यों उसका दामन खींचता है कोई 
क्यों वह रातों को डर डर न सोई 
क्यों उसे ही सब झेलना है 
सहना समाज़ की अवहेलना है 
क्यों उसे चुप्पी का पाठ पढ़ाया 
सब दर्द लेकर भी सहना सिखाया 
उसी को बाप भाई का रिश्ता बताया 
क्यों उसी को त्याग की मूर्ति बनाया 
सिर्फ औरत बनाता मर्द नहीं 
सिर्फ़ खुशियाँ सजाता दर्द नहीं 
जो खुशियां लुटाती सिर्फ माँ बनाता 
ममता की प्रतिमाओं से दुनिया सजाता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता ?

क्यों ऐसे आदमी बना दिए बाप 
जो अपनी ही बेटियों से करने लगे पाप 
वात्सल्य और वासना में फ़र्क़ नज़र नहीं आता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

नन्ही नन्ही परियाँ जो उड़ना नहीं जानती
जिनकी भोली आँखे कपटता नहीं पहचानती 
क्यों तू उनका सरंक्षक बन नहीं पाता ?
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

क्यों ऐसी दुनिया बनाई विधाता?
या उनको बनाता या हमको बनाता 
कुछ इस तरह से दुनिया सजाता।

 Copyright Mridual aka writingdoll

Yes, I am a feminist if that is what my strong views about atrocities on women and girls make me. My heart goes out every time I see an addition to my #BrokenDollHouse.  I am angry with my God for creating a world such as this. How could HE create such barbaric, callous creatures to be called as human beings? This is my dialogue with HIM on this Ekadashi, 22nd July with tearful eyes.

Recited it at #FWA Kavi Goshthi on 20th Feb 2015

Read poignant poetry.  Every poem is based on a real incident or narrative by real people.

Wednesday, July 16, 2014

अब नहीं


अब नहीं

बहुत छुपाया
 बहुत छुपी 
बहुत सहमी
 बहुत डरी

पर अब नहीं।

 तकलीफ़ें
 मुश्किलें
 रुकावटें 

चुप्पी साधे 
 कई साल बीते 

पर अब नहीं।

आँसू 
 शिकायतें 
बेतुकी रिवायतें 

फ़िज़ूल निभाया 

पर अब नहीं।

यादों से कहा है 
जब जी चाहे आओ 
जाओ
 न मुझको आज़माओ 

अब फ़र्क़ पड़ता
रत्ती भर नहीं।

अब नहीं।

Copyright@Mridual aka writingdoll

Wednesday, July 2, 2014

मैंने कहा बादल से

मैंने कहा बादल से:
"अरे नाराज़ हो क्या? 
पल्स पोलियो की बूँदों की तरह 
दो दो बूँद टपका कर चल देते हो"-
कल यही शिकायत की थी मैंने।
"बरसा दो बारिश को बारिश की तरह"-
बस यही गुज़ारिश की थी मैंने।
और तुम बरस पड़े 
जोर जोर से 
घर में पानी घुस आया 
बालकॉनी की ओर से,
पर इसकी शिकायत तुमसे नहीं है।
तुम तो बरसो
जम के बरसो
झम झम बरसो

मन मयूर सा नाच उठा है 
पेड़ो के पत्ते निखर से गए हैं 
कबूतर छज्जों से सट कर दुबक गए हैं 
सड़क धुल गयी है 
लो, पहली छतरी खुल गयी है
धीरे धीरे कई रंग बिरंगी छतरियाँ 
काली बेरंग सड़क पर 
चलने फिरने लगी हैं।
वह खूबसूरत लबादों में,
जिन्हें रेन कोट कहते हैं 
ये स्कूली बच्चे
कितने प्यारे लगते हैं, 
पर रेन कोटों में इनकी पीठ पर 
ऊँट के कूबड़ की तरह 
उभरा हुआ बस्ता 
और पानी से भरे 
गड्ढ़ों वाला रस्ता,
बस यही खलता है,
पर इसकी शिकायत तुमसे नहीं है।
तुम तो बरसो
जम के बरसो
झम झम बरसो

सुनो, अब किसी रोज़ मैं 
छतरी घर पे भूल आऊँगी 
तुम्हारी ताज़ा तरीन बारिशों में 
पूरा भीग जाऊँगी,
अरे वैसे तो लोग 
बारिश को तरसते हैं 
पर बरसने लगे
तो छुपने को भगते हैं,
ना, यह भी शिक़ायत तुमसे नहीं है।
तुम तो बरसो
जम के बरसो
झम झम बरसो


और तुम्हारे धुंधले ठहरे पानी में भी
रंगीन छवियाँ बहुत भाती हैं
वैसे तो तुम्हारी काली घटाएँ
सब रूमानी कर जाती हैं 
पर तुम्हारी बारिश की चंद बूँदें
कम्बखत यादें बहुत सी ले आती हैं,
अरे इसकी भी शिकायत तुमसे नहीं है। 
तुम तो बरसो
जम के बरसो
झम झम बरसो


Yesterday I wrote a blog post guzarish-baarish-ki on my blog Fortified Quirkies U/A and today morning I wrote this poem. Recited this poem @FWA's inaugural Poetry Event in June 2015. Please do not copy, paste or reproduce in any form without my written consent. Copyright@Mridual aka writingdoll