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Monday, September 17, 2018

बप्पा

होने लगा है धूम धड़ाका 
लो आ गए गणपति बप्पा 
ढोल नगाड़े धक्कम धक्का 
ट्रैफिक में अटके हैं बप्पा 
यहां के राजा वहां के राजा 
हर एक गली के अपने बप्पा 
विशेष अतिथि का है सम्मान 
और वही मेहमान हैं बप्पा 
कितने रूपों स्वरूपों में 
सर्वव्यापी गणपति बप्पा 
छप्पन भोग लगा लो चाहे 
मोदक खा कर मस्त हैं बप्पा 
मसरूफ लोगों के घर में 
एक आध दिन ठहरते बप्पा 
गौरी मां संग पंचम दिन 
बहुत घरों से जाते बप्पा 
बड़े-बड़े पंडालों में तो 
देखो कैसे सजे हैं बप्पा 
रोशनी की भरमार में 
सारी रात जगे हैं बप्पा 
दस दिन के त्यौहार में
बड़े बड़े इश्तिहार में 
क्या क्या देख रहें हैं बप्पा 
कुछ ने मन से किया भजन 
कुछ फिल्मी धुन में रहे मगन 
सब की मंशा जान रहे हैं 
तर्क समझने वाले बप्पा 
कौन हैं करते उनकी पूजा
और जो करते काम दूजा 
कुछ भी उन से छिपा नहीं है 
सभी जानते गणपति बप्पा 
अनंत चतुर्दशी के दिन 
अनंत में समा जाते बप्पा 
अगले वर्ष लौटने का 
वादा करके जाते बप्पा
मन की आंखों से देखो तो 
अपने भीतर बसते बप्पा 
सच्चे मन से नमन करो तो 
बस पुलकित हो जाते बप्पा 
बप्पा कहीं नहीं जाते हैं
कहीं नहीं जाते हैं बप्पा 

—-मृदुल प्रभा


Tuesday, March 13, 2018

मुंबई शहर में मेहमान आए हैं


मुंबई शहर।  चित्र : मृदुल प्रभा @writingdoll fotografie
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

गूंगे बहरों के इस शहर में
कहने अपनी दास्तान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

यह दाना दाना बोते हैं
फसलों संग जगते सोते हैं
कम पैसों में फसल बेच के
खून के आंसू रोते हैं
अपनी मेहनत का सही दाम हो
ढूंढने कोई समाधान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए है 
नाशिक पार से किसान आए हैं

पांव में इनके छाले हैं
हौसले इन के निराले हैं
तपती सड़क पर मिलो चल कर
छोटे बच्चे घरवाले लेकर
एक सच्चे वादे के लिए
छोड़ कर खेत और खलिहान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

शायद कोई अंकुर फूटे
शायद फल जाए मेहनत इनकी
सियासत की बंजर धरती पर
आशा का बीज बोने नादान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

धरती में जीवन बोने वाले
मरने को मजबूर हैं
और शहरों में रहने वाले
सच्चाई से दूर हैं
इसलिए लाल झंडे लेकर
हरे खेत को छुट्टी देकर
हक मांगने आए हैं
नहीं लेने किसी का एहसान आए हैं
मुंबई शहर में मेहमान आए हैं
नाशिक पार से किसान आए हैं

--मृदुल प्रभा


Thursday, November 24, 2016

माँ

माँ घर में रहती थी
हमारी ज़रूरतें पूरी करती थी
हर तरह की ज़रूरतें
हम सभी की ज़रूरतें
माँ हमारी सीढ़ी बनी
हम ज़मी से आसमान हो गए
हम ज़िंदगी की तेज़ रफ़्तार में
उसकी धीमी धीमी ज़िंदगी को पीछे छोड़ते चले गए

माँ जो घर की हर चीज़ में समायी रहती थी
अब सिमट गयी है एक कोने में
एक बिस्तर पर वक़्त की चादर लपेटे
इंतज़ार आँखों में समेटे
माँ बहुत कुछ कहना चाहती है पर कहती नहीं

हम स्वार्थी हैं, ये भी माँ जानती है
माँ अब हमारी स्वार्थी हो जाने की ज़रूरत को पूरा करती है।

।। मृदुल प्रभा ।।

Saturday, November 14, 2015

चल बच्चे बन जाते हैं

चल बच्चे बन जाते हैं
बचपन में लौट जाते हैं,
सहज और सरल हो जाते हैं
भरी दुपहरी में खेल के आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

तुम अमियाँ तोड़ के लाना
मैं नमक मिर्ची लाऊँगी
बरसाती में बैठ के चटखारे ले के खाते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

मिट्टी पे नाम लिखते हैं
स्लेट पे शक्लें बनाते हैं
और दिल के किसी कोने में ढाँप के रख जातें हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

बहोत दिनों से तुम घर पे नहीं आए
चल घर घर खेलते हैं
एक दूसरे के घर हो आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

शायद किसी का मकां बन रहा है,
रेत का ढ़ेर आया है
चल न, रेत में हम भी घर बनाते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं 

शरारत करने का मन है
मंदिर के पास वाले पीपल के पेड़ से
किसी की मन्नतों के धागे खोल आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

चकाचौंध बहोत है सपनों के शहर में
तेज़ रौशनी में दोस्त भी नहीं दिखते
चल अपने छोटे से शहर हो आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं

चल अबकी बार होली में
कच्ची उम्र के पक्के रिश्ते
रंगों से भर आते हैं, चल बच्चे बन जाते हैं



Saturday, July 4, 2015

ਔਖਾ ਜੇ ਨਿਭਾਉਣਾ ਹੋਵੇ ਪਿਆਰ ਨਹਿਯੋੰ ਪਾਯੀਦਾ

ਔਖਾ ਜੇ ਨਿਭਾਉਣਾ ਹੋਵੇ ਪਿਆਰ ਨਹਿਯੋੰ ਪਾਯੀਦਾ
ਦਿਲ ਪਰਚਾਉਣ ਲਯੀ ਯਾਰ ਨਹੀਂ ਬਨਾਯੀਦਾ

औखा जे निभौना होवे प्यार नहींओ पाइदा
दिल परचौंण लई यार नहीं बनाईदा
जिस्मा दे रिश्ते बाजार विकदे ने
जिस्मा दे रिश्ते लई यार नहींओ चाहिदा

प्यार जिस विच बसे दिल घर रब दा
पाक इरादे होण यार बसे सब दा
चलाकियाँ  दे नाल हथ मार नहींओ जाइदा
औखा जे निभौना होवे प्यार नहींओ पाइदा ....

लड़ जिहदा फड़ लईऐ रिश्ता निभाईदा
औखे समे विच कल्ले छड नहींओ जाइदा
सच्चा प्यार वडियाँ मुरीदाँ नू है मिलदा
झूठियाँ कहानियाँ च जड़ नहींओ जाइदा…
औखा जे निभौना होवे प्यार नहींओ पाइदा ....

मृदुल 

Recited it on the inaugural Poetry Event of FWA.  Please do not copy, paste or reproduce in any form without my written consent. All creative works on my blog are registered. Copyright@Mridual aka writingdoll