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Friday, December 5, 2014

स्वच्छ सुन्दर भारत यह मेरा सपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

तन भी साफ़, मन भी साफ़
हो लोगों का जीवन साफ़
स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत
यही मेरी कल्पना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

मन में आस, मन में विश्वास
जहाँ देवो का हो वास
'स्वच्छ सुन्दर भारत'
यही मूल मंत्र जपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है

जहाँ धरती माँ हो हरी भरी
जहाँ नदियों का जल हो निर्मल
जहाँ स्वच्छता का हो आभास
और सब कुछ लगे ख़ास
मुझे उस भारत में बसना है
वह भारत मेरा अपना है

स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा सपना है
स्वच्छ सुन्दर भारत मेरा अपना है


I had written this poem around Independence day.  Those who know me can understand how I feel about this cause. I, along with my friends had taken up Cleanliness Drive in our building three years back against all odds and transformed the surroundings. We still do periodic follow up. There is plenty to do and if we all do a little bit we will create the most beautiful world around us. It extends towards spirituality. From cleaning outside to our inner-selves. 
Copyright. mridual aka writingdoll

Tuesday, October 14, 2014

My life..untitled..(on this birthday)

न जाने आज मेरा कौन सा बर्थ डे है
तीन साल पहले ही तो पहला वोट दिया है
मैं उम्र को सालों में गिनती नहीं हूँ 
इन नम्बरों सालों को समझती नहीं हूँ

बेकार ब्यूटी ट्रीट्मेंट्स मैं कराती नहीं
बेवजह उम्र को भी मैं छुपाती नहीं
कैसा है जैसा है वैसा यह तन है
पर बच्चों का सा चंचल यह मन है

हर सुबह सूरज से धूप ले आती हूँ 
हर शाम चंदा के संग बतियाती हूँ
हँसती हूँ और गुनगुनाती हूँ
बच्चों सी खिलखिलाती हूँ

किसी किसी दिन थोड़ी बड़ी भी हो जाती हूँ
उस दिन गंदे कबूतरों की कलास लगाती हूँ
कुछ बेचारे कौवे भी सुबह को आ जातें हैं
उन्हें कभी कभी पंजाबी परांठे खिलाती हूँ

संवेदनशील कुछ ज़्यादा हूँ
सो भावुक हो पड़ती हूँ
मेरे बच्चे मुझ पे हँसते हैं
जब मैं यूँ ही रो पड़ती हूँ

वो भी फ़िकरे कसता है
जो मेरे अन्दर बसता है
"तुम सचमुच बेमिसाल हो
लुत्फ़ की टक्साल हो"
कह कर वो हँस पड़ता है

"थैंक यू, सब खुद ही करवाते हो
और मेरा नाम लगाते हो
मेरी हर ख़ुशी में तुम
कितने खुश हो जाते हो"
मैं सीटी मार चल देती हूँ

मगरूर नहीं मशहूर नहीं
पर मैं शोहरत से दूर नहीं
जब पाँवो से थक जाती हूँ
तो मैं उड़ने लग जाती हूँ.

मैं ज़िन्दगी के हरेक रस को
निचोड़ कर पिए जाती हूँ
इक इक पल में इक जीवन
कुछ ऐसे मैं जिए जाती हूँ

I share my birthday with Cliff Richard...I like his songs, full of life, very happy.. My birthday is my stock taking day. Today when I started my day this is exactly how I felt. So I wrote this poem. My mind refuses to grow old or get tired or feel sad.. There is so much to do in one life time... so so much. So I can not afford to waste my time..even with my aching feet I will go on...may be take off and start flying.. because someone out there is going to give me the wings and show me the way.

A heart felt thank you to so many friends who wished me today. I am overwhelmed with the love and blessings. I have every reason to smile. :) and laugh :D Thank you God.

Friday, July 25, 2014

कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

या मर्द बनाता या औरत बनाता
या उनको बनाता या हमको बनाता 
कुछ इस तरह से दुनिया सजाता

यह लाँछन लगाते हैं दर्द पिरोते हैं
खंजर चुभोते हैं ऐसे मर्द होते हैं
कैसे ये समझें न रिश्ता न नाता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

क्यों औरत बनाई डरी सकुचाई
निर्भय हुई भी तो मर्द की परछाई 
क्यों उसका दामन खींचता है कोई 
क्यों वह रातों को डर डर न सोई 
क्यों उसे ही सब झेलना है 
सहना समाज़ की अवहेलना है 
क्यों उसे चुप्पी का पाठ पढ़ाया 
सब दर्द लेकर भी सहना सिखाया 
उसी को बाप भाई का रिश्ता बताया 
क्यों उसी को त्याग की मूर्ति बनाया 
सिर्फ औरत बनाता मर्द नहीं 
सिर्फ़ खुशियाँ सजाता दर्द नहीं 
जो खुशियां लुटाती सिर्फ माँ बनाता 
ममता की प्रतिमाओं से दुनिया सजाता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता ?

क्यों ऐसे आदमी बना दिए बाप 
जो अपनी ही बेटियों से करने लगे पाप 
वात्सल्य और वासना में फ़र्क़ नज़र नहीं आता 
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

नन्ही नन्ही परियाँ जो उड़ना नहीं जानती
जिनकी भोली आँखे कपटता नहीं पहचानती 
क्यों तू उनका सरंक्षक बन नहीं पाता ?
कैसी यह दुनिया बनाई विधाता?

क्यों ऐसी दुनिया बनाई विधाता?
या उनको बनाता या हमको बनाता 
कुछ इस तरह से दुनिया सजाता।

 Copyright Mridual aka writingdoll

Yes, I am a feminist if that is what my strong views about atrocities on women and girls make me. My heart goes out every time I see an addition to my #BrokenDollHouse.  I am angry with my God for creating a world such as this. How could HE create such barbaric, callous creatures to be called as human beings? This is my dialogue with HIM on this Ekadashi, 22nd July with tearful eyes.

Recited it at #FWA Kavi Goshthi on 20th Feb 2015

Read poignant poetry.  Every poem is based on a real incident or narrative by real people.

Thursday, July 17, 2014

To My Love

To My Love

Its been ages
since I left your home
to wander and to explore
from one lifetime to another

So long
since I felt the comfort of your arms
getting suffocated
in the arms of many men
in many lifetimes
yearning for true love
that was never there

Many lives
of fleeting pleasures
and never ending pain
Many lifetimes
of disgust, guilt, penance
and shame

A very tiring 
long journey
of superficial unions
in the make believe world
like a deep slumber
with dreams
so unreal

I am awake
at last
Nothing allures me any more
I want your love
just like before...


There have been some wonderful changes in my life and I know I have found back my love. I am still a sinner and stuck in the muck but I am aware and I am calling out my Krsna to pull me out...He is smiling at me.. He wants me to try some more.. I am certain He will hold my hand and embrace me forever.  (These words came out on paper sometime last month..)

Copyright Mridual aka writingdoll

Wednesday, July 16, 2014

अब नहीं


अब नहीं

बहुत छुपाया
 बहुत छुपी 
बहुत सहमी
 बहुत डरी

पर अब नहीं।

 तकलीफ़ें
 मुश्किलें
 रुकावटें 

चुप्पी साधे 
 कई साल बीते 

पर अब नहीं।

आँसू 
 शिकायतें 
बेतुकी रिवायतें 

फ़िज़ूल निभाया 

पर अब नहीं।

यादों से कहा है 
जब जी चाहे आओ 
जाओ
 न मुझको आज़माओ 

अब फ़र्क़ पड़ता
रत्ती भर नहीं।

अब नहीं।

Copyright@Mridual aka writingdoll